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आनलाइन शिक्षा और चनौतियां
आनलाइन शिक्षा और चुनौतियां


आनलाइन शिक्षा और चुनौतियां

"अलग अलग छात्रों और समूहों क साथ मिल कर कक्षाओं मॅ पढाई करने से बेहतर समझ विकसित होती है । इसक विपरीत, आँनलाइन पढाई से शिक्षा का सारा बांझ सिर्फ एक व्यक्ति बिशेष पर कद्रित हो जाता है, जिसमें छात्र सिर्फ डिजिटल तकनीक और गैठोटों पर निर्भर हो जाता है और इसका सबसे घातक नतीजा यह होता है कि ज्ञान अर्जन एकांकी रूप ले लेता है।"

ऑनलाइन शिक्षा में चुनौती

ऑनलाइन शिक्षा और परीक्षा के संबंध में हाल में जिस तरह के फैसले हुए हैँ, वे वक्त की मांग तो हैँ लेकिन व्यावहारिकता की कसौटी पर खरे उतर पाएंगे, इसमें संदेह है । देश के तमाम विश्वविद्यालयों ने अब अपने यहां न केवल शिक्षण कार्य, बल्कि परीक्षा जैसे काम तक आनलाइन शुरू कराने का फैसला किया है । इस कवायद से छात्रों की मुश्किले बढना स्वाभाविक है । इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक मुविकलों और तकनीकी संसाधनों के अभाव में आनलाइन शिक्षण की सुविधाएं सर्वसुलभ नहीं हैँ, और इस वजह से छात्रों और शिक्षकों को इसमें तात्कालिक तैर पर दिवकतों का सामना करना पढ़ रहा है । लेकिन, दूसरी और हमारे सामने अब बदलती दुनिया में तकनीक के साथ चलने की चुनौती भी है । आज दुनिया के तमाम शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय आनलाइन चल रहे हैं। अगर हमें उनके साथ दौड़ में शामिल होना है तो ओनलाइन शिक्षा प्रणाली को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । बस, संवाल इतना भर है कि भारत जैसे देश में इसे आसानी से केसे स्वीकार्य बनाया जाए ।


पूर्णबंदी से जूझ रही दुनिया में अब ज्यादातर कामकाज आनलाइन शुरू हो चुके हैं । कहना न होगा कि जीवन का बडा हिस्सा आनलाइन संस्कृति में ढलने को मज़बूर हो चुका है । इसी क्रम में आनलाइन शिक्षा भी एक विकल्प के रूप में सामने आई है । किसी ने सोचा भी नहीं था कि स्कूली बच्चे तक आनलाइन कक्षाओं मेँ शामिल होंगे । लेकिन अब यह हो रहा है, भले अड़चनें कितनी ही क्यों न हों । दरअसल, भारत के शिक्षा जगत की जमीनी हकीकत दुनिया से अलग है । अमेरिका, जापान और पश्चिमी यूरोप के देशों मेँ, जहां हर व्यक्ति तक तकनीक की पहुंच दूसरे देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा है, वहां पर भी शिक्षाविदों के बीच में आनलाइन शिक्षा और परीक्षा के बारे में एक राय नहीं है । अमेरिका में ही आनलाइन पढाई करने वाले छात्रों की सफलता दर प्रत्यक्ष कक्षाओं के छात्रों की तुलना में आठवां हिस्सा ही है ।



पूर्णबंदी के कारण देश भर में छात्रों की पढाई बाधित हुई है । यह स्थिति देश के स्कूलों . से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक में देखने को मिल रही है । इस तरह की आपात ' परिस्थितियों में अनिलाइन शिक्षा व्यवस्था विभिन्न विश्वविद्यालयों मेँ लागू की गई औंर पाठ्यक्रम को पूरा मान कर आनलाइन परीक्षाएं कराने की तैयारियां भी चल रही हैं । लेकिन हकीकत यह है कि न सिर्फ देश के विभिन्न क्षेत्रीय शैक्षणिक संस्थान, बल्कि कईं केद्रीय विश्वविद्यालय भी इस दिशा में कदम बढाने को लेकर दुविधा में हैं । इसका बडा कारण है कि संसाधनों की उपलब्धता के बारे में वे अच्छी तरह जानते हैँ । शिक्षण संस्थानों के पास तो फिर संसाधन हो सकते हैं, भले सीमित हों, लेकिन छात्रों का बडा वर्ग ऐसा है जिसके पास आनलाइन शिक्षा के लिए आवश्यक संसाधन नहीं हैं । यहीँ वह प्रमुख बिंदु है जो आनलाइन शिक्षण और परीक्षा को लेकर सबको चिंतित कर रहा है । छात्रों की पढाई बाधित होने का प्रतिकूल प्रभाव आगे जाकर उनके रोजगार की तैयारियों पर भी पड़ेगा । आनलाइन शिक्षा की चुनौतियों को नजरअंदाज करना इसके लक्ष्य में बडी बाधा साबित हो सकता है । छात्रों और शिक्षकों से यह उम्मीद की जा रही है कि वे तत्काल इस प्रणाली को आत्मसात कर लें और आनलाइन ऐप, ई रिसोर्स व अन्य आनलाइन शिक्षण के तरीकों से सामान्य दिनों की तरह शिक्षण गतिविधियां चलाते रहें । लेकिन व्यावहारिक रूप से क्या ऐसा संभव हो पाएगा, यह बडा सवाल है । इस आँनलाहन कवायद का नतीजा अब तक इस रूप में सामने आया है, जिसमेँ एक शिक्षक किसी भी तरह से अपने पाठयक्रम क्रो पूरा करने औपचारिकता में लग गया है, और दूसरी और बहुसंख्यक छात्र आनलाइन शिक्षण पद्धति की समस्याओं से जूझ रहे हैं ।



भारत में उच्च शिक्षा की समस्या

यह एक असाधारण दौर है और ऐसे समय में बेशक नए प्रयोगो की जरूरत है । चुनौतियों का सामना करने के लिए मानब संसाधन विकास मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) औंर विथिन्न विश्वविद्यालयों से लेकर कालेज के शिक्षक तक, सभी नए और सकारात्मक प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन हमेँ यह नहीं भूलना चाहिए कि इसका एक दूसरा पक्ष भी है और वह हैँ हमारे छात्र । हमारे विश्वविद्यालयों में बिभिन्न पृष्टभूमियों से छात्र आते हैँ । इनमें से बहुत से छात्र पहले से ही जाति, वर्ग, लिंग, धर्म, भाषा, क्षेत्र, आदिवासी पृष्टभूमि या शारीरिक निशक्तता के आधार पर कई तरह की चुनौतियां झेल रहे हैं । केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रों का एक बढा हिस्सा दूसरे शहरों से आने चाले छात्रों का है जो मार्च में छुट्टियों मेँ अपने घर चला गया । अपने घरों मेँ हन छात्रों के पास किताबों सहित दूसरी अध्ययन सामग्री नहीं हैँ । ऐसे में छात्रों के सामने सवाल है कि कैसे पढाई कों । इन छात्रों की यह मुश्किल तकनीकी संसाधनों के अभाव क्री वजह से है । छात्रों का एक बढा हिस्सा ऐसे क्षेत्रों से अस्ता है जहाँ इंटरनेट की समस्या है । ऐसे छात्रों की संख्या भी कम नहीं है जिनके पास लेपटॉप जैसी सुबिधा नहीं है । स्मार्टफोन के सहारे पढाई संभव नहीं है ।


अध्यापक शिक्षा की चुनौतियाँ

इसी तरह निशक्तज़न छात्रों क्री विशेष जरूरतों पर भी ध्यान देना होगा, जिनकी आनलाइन पढाई के लिए बांक्ति तकनीक तक पहुंच नहीं है और जो शिक्षण संस्थानों में मुहैया कराए जाने वाले संसाधनों और सुविधाओँ पर ही पूरी तरह से निर्भर हैँ । यह विडंबना ही है कि आनलाइन शिक्षण का यह संकट विश्वविद्यालय व्यवस्था के हाशिये पर मौजूद दूरस्थ माध्यम मेँ पढ़ने बाले छात्रों की शिक्षा में लंबे समय से चल रहे संकट का एक हूबहू रूप है । पिछ्ये दशक में विश्वविद्यालयों में छात्रों के दाखिले में बढोत्तरी हुई है । दिल्ली विश्वविद्यालय का ही उदाहरण ले । यहां हर साल स्कूल आफ ओपन लर्निंग (एसओएल) में एक लाख से ज्यादा छात्र दाखिला लेते हैं । ज्ञात हो कि दूरस्थ शिक्षा प्रणाली में ज्यादातर छात्र सामाजिक रूप से पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं । नियमित कालेजों में सीटों क्री कमी के कारण या आर्थिक दिबकतों क्रे कारण दाखिला न ले पाने वाले छात्र वेहद खराब ढंग से चल रही दूरस्थ शिक्षा प्रणाली में पढाई करने को मजबूर हैं, जहां बिना कक्षाओं के ही पाठयक्रम पूरा कराना और गुणवत्तापूर्ण पाट्य सामग्री का अभाव एक आम बात है ।

उच्च शिक्षा में बदलाव की जरूरत

यह सर्वमान्य तथ्य है कि बिभिन्न सामाजिक आर्थिक पृष्टभूमि से आने चाले छात्रों क्री पढ़ने क्री क्षमताएं भी भिन्न होती हैं । ऐसे में उनकी जरूरतों को सिर्फ प्रत्यक्ष कक्षाओं मेँ ही बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है । अलग अलग छात्रों औंर समूहों के साथ मिल कर कक्षाओं मेँ पढाई करने से बेहतर समझ विकसित होती है । इसके विपरीत, आँनलाइन पढाई से शिक्षा का सारा बोझ सिर्फ एक व्यक्ति विशेष पर केद्रित हो जाता है, जिसमें छात्र सिर्फ डिजिटल तकनीक और गेजेटों पर निर्भर हो जाता है और इसका सबसे घातक नतीजा यह होता है कि ज्ञान अर्जन एक एकांगी रूप ले लेता है ।



प्राथमिक शिक्षा की समस्याओं और समाधान

 छात्रों के अल्पकालिक और दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखने के लिए नीति निमार्ताओं क्रो शिक्षकों ओंर छात्रों की चिंताओं के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है । बेहतर हो कि अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए मौजूदा सत्र को थोडा सा बढाया जाए, ताकि स्थिति ठीक होने पर एक निश्चित समय सीमा के लिए उनके लिए कक्षाएं और पीसीपी (पर्सनल काटैवट प्रोग्राम) के सत्र आयोजित किए जा सकें । इसके बाद ही परीक्षाओं के लिए या तो अतिरिक्त आंतरिक परीक्षण के तरीकों को अपनाया जा सकता है या बाह्य परीक्षा की योजना बनाई जा सकती है । आज जरूरत इस बात की है कि हम शिक्षण संस्थानों मेँ आए सकट स्ने बाहर निकलने के लिए ऐसे उपायों पर अमल कों जिनमें सभी के हितों का समावेश हो । 


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