Ad

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भारतीय संविधान में संघ तथा राज्य की समस्त वित्तीय कार्य प्रणाली पर नजर रखने के लिए एक स्वतंत्र "नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक" नियुक्त किए जाने पर प्रावधान किया गया है। 1857 ई0 मे तत्कालीन 3 प्रेसिडेंसी ( कोलकाता, मद्रास तथा बंबई) के लेखो को प्रमाणित करने के उद्देश्य से लॉर्ड कैनिंग ने सर्वप्रथम महालेखा परीक्षक के पद का सृजन किया था। स्वतंत्रता प्राप्ति पर भारतीय संविधान द्वारा महालेखापरीक्षक को भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक पद का नाम दिया गया तथा उसे उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों की भांति संवैधानिक अधिकारी बनाया गया। भारतीय संविधान का भाग 5 अनुच्छेद 148 से 151 भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के बारे में है। अनुच्छेद 148 में कहा गया है कि भारत का एक नियंत्रक महालेखा परीक्षक होगा जिसका नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा। उसका वेतन और अन्य सेवा शर्तों के लिए संविधान मौन है यह सारे अधिकार भारतीय संसद को दिया गया है इस अधिकार का प्रयोग संसद द्वारा नियंत्रक महालेखा परीक्षक( कर्तव्य शक्तियां एवं सेवा शर्तें )अधिनियम 1971 पारित किया गया है।


संसद के द्वारा निर्धारित पद ग्रहण करने की तिथि से 6 वर्षों की अवधि तक या 65 वर्षों की आयु तक (जो भी पहले हो) अपना पद धारण करता है किंतु वह भी अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को दे सकता है।
नियंत्रक महालेखा परीक्षक को पद से उसी प्रकार से हटाया जा सकता है जिस प्रकार से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया है।


वह अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति के समक्ष अनुसूची 3 में दिए गए प्रस्ताव के अनुसार शपथ लेता है इसका वर्णन 148(2) मे है।
इसका वेतन उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के वेतन के समान होता है। इसका वेतन भत्ता व पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित होता है।
कार्य एवं शक्तियां :-
 अनुच्छेद 149 मे नियंत्रक महालेखा परीक्षक की कर्तव्य एवं शक्तियों के बारे में है। इसमें कहा गया है कि नियंत्रक महालेखा परीक्षक संघ की ओर राज्यों के तथा किसी अन्य प्राधिकारी या निकाय के लेखाओं  के संबंध मे ऐसे कर्तव्य का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे जिन्हे संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन विहित किया जाए ।


वह भारत का प्रत्येक राज्य और प्रत्येक संघ राज्य क्षेत्र की संचित निधि से किए जाने वाले सभी व्यय की संपरीक्षा करेगा तथा इस सम्बन्ध में यह प्रतिवेदन देगा कि क्या ऐसा विधि के अनुसार किया गया है।
वह संघ तथा राज्य की आकस्मिक निधि तथा लोक लेखाओं से किये जाने वाले सभी व्यय की संपरीक्षा करेगा तथा उन पर प्रतिवेदन देगा।
वह संघ या राज्य के विभिन्न विभागों द्वारा किए गये सभी व्यापार निर्माण लाभ तथा हानि लेखोओं की संपरीक्षा करेगा तथा उन पर प्रतिवेदन देगा।
संघ और राज्य के लेखाओं संम्बन्धी प्रतिवेदनों को ऐसे प्रारूप में राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है जो राष्ट्रपति नियंत्रक महालेखा परीक्षक की सलाह से नियत करता है इसका वर्णन अनुच्छेद 150 मे हैैं।


नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट केंद्र सरकार के मामले में संसद की लोक लेखासमिति को जांच के लिये सौंपी जाती है तथा राज्य के मामले में राज्य विधान मंडल को लोक लेखा समिति को जांच के लिए सौंपी जाती है भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक को लोक लेखा समिति का मित्र और मार्गदर्शक कहा जाता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post