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दलबदल विरोधी कानून
दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता , हिंदी में एक कहावत है "जिसकी लाठी उसकी भैस" और देश की संसदीय व्यवस्था में चरितार्थ होती इस कहावत पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने चिंता ज़ाहिर की है। बीते दिनों दलबदलुओं के ख़िलाफ़ सख्त टिप्पणी करते हुए। कोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून का उल्लंघन करने वालों को शीघ्र उनके पद से हटाने की बात कही है ।
मणिपुर के विधायक द्वारा दल बदल करने संबंधी याचिका सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि लोकसभा व विधानसभा अध्यक्ष को मुनासिब समय में सदस्यों की अयोग्यता पर फैसला करना चाहिए। 
  •  इससे आगे बढ़कर कोर्ट ने संसद को स्पीकर की शक्ति पर दोबारा विचार करने की सलाह है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा प्राधिकरण या स्वतंत्र संस्था बनाने का सुझाव दिया है जो सांसदों और विधेयकों की अयोग्यता के मामलों पर निर्णय लें हालांकि कोर्ट ने टिप्पणी करने में लंबा वक्त लिया । क्योंकि नेताओ की कूद फांद और स्पिकरों की भूमिका पर सवाल दल बदल विरोधी कानून बनने के बाद भी दशकों से जारी है।  
  • ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद कई सवाल फिर से खड़े हो गए हैं ।
  • पहला सवाल है कि क्या दलबदल विरोधी कानून नाकाम हो गया है ? सवाल है कि क्या स्पीकर जैसी संस्था राजनीतिक स्वार्थ के चलते अपनी जिम्मेदारी निष्पक्षतापूर्वक नहीं निभा पा रही है । हालांकि सच यह है कि दल बदल एक राजनीतिक समूह क्या है ।
  •  तीन दशक पहले उसका कानूनी समाधान निकालने की कोशीश की गई थी , ऐसे में यह सवाल तो सहसा ही उठता है कि आखिर इस समस्या का समाधान कैसे निकाला जाए ।क्या हुआ कई एक स्वतंत्र संस्था बनाने की जरूरत है। यह शक्ति स्पीकर से चुनाव आयोग को हस्तांतरित कर देने की जरूरत है। आइए विचार करते हैं।
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    दलबदल विरोधी कानून

दलबदल विरोधी कानून की पृष्ठभूमि 

भारतीय राजनीति दल बदल की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है। भले ही हालिया वर्षों में गोवा, तेलंगाना ,कर्नाटक ,अरुणाचल प्रदेश ,उत्तराखंड में ऐसे मामले देखे गए हो लेकिन भारतीय राजनीति की यह बीमारी बेहद पुरानी है ।

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  • राजनीति में एक पुराना मुहावरा है "आयाराम गयाराम"  यह कहावत को यूं ही नहीं है इसके पीछे एक राजनीतिक घटना है । दरअसल 1967 में एक ही दिन के भीतर हरयाणा  के एक विधायक तीन बार पार्टी बदलने की एक नई प्रवृत्ति देखने को मिली उस विधायक का नाम था गयाराम अब से ही "आयाराम गयाराम" मुहावरा भारतीय राजनीति में अच्छा खासा लोकप्रिय हो गया। 1967 वो साल था  ,जब केंद्र में तो कांग्रेस की सरकार बन गयी लेकिन सात राज्यों में कांग्रेस हार गयी । इनमें से अधिकतर कांग्रेसी विधायक दूसरे दलों में चले गए थे और ऐसा बार बार हो रहा था। ऐसा खाना जा रहा था कि विधायक किसी लालच की आड़ में दलबदल कर रहे थे ऐसा करके वे बार बार राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रहे थे । इससे देश के सही सोच वाले राजनीतिक नेताओं को गंभीर चिंता हुई इसलिए समस्या की ।
  • इसका पड़ताल करने के लिए Y V चौहान नामक पैनल बना था , पैनल की रिपोर्ट के बाद 70 के दशक में उमा शंकर दीक्षित और शांति भूषण की अगुवाई में इस समस्या को खत्म करने की कोशीश हुई । लेकिन कोशीश नाकाम रही।
  •  इसे रोकने के लिए कानून बनाने के कई  प्रयास किए गए । निजी सदस्य और सरकार के बिल को संसद में अलग अलग समय में लाया गया, लेकिन कुछ कारणों से कोई भी विधेयक पारित नहीं होसका ।

आखिरकार 1985 में यह इंतज़ार खत्म हुआ। और तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार संसद में संविधान संशोधन विधेयक लेकर आयी संसद के दोनो सदनों से विधेयक पारित हुआ। और दल बदल पर अंकुश लगाने के लिए संविधान में 10 वीं अनुसूची जोड़ी गई ।
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दलबदल विरोधी कानून

10 वीं अनुसूची का दलबदल क़ानून

दरअसल 1985 में 52 वां संविधान संशोधन कर दल बदल प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की कोशीश की गई। इसके तहत संविधान के चार अनुच्छेद 101,  102, 190 और 191 में संशोधन किया गया । और इसी के तहत संविधान में 10 वीं अनुसूची का प्रवेश हुआ ।
यहाँ गौर करने वाली बात यह कि दसवीं अनुसूची अनुच्छेद 102(2) और 191(2) संबंध हैं। इसमें सांसदों एवं विधायको को दलबदल के आधार पर अयोग्य घोषित करने के प्रावधान हैं।
  •  यही कारण है कि संविधान में इस व्यवस्था को अमूमन दल बदल विरोधी कानून कहा जाता है। इसमें सदस्यों की अयोग्यता के लिए परिस्थितियों का जिक्र है, मसलन जब किसी भी सदन का सदस्य स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है , कितनी पार्टी व्हिप का उल्लंघन कर सदन में मतदान करता है, यह मतदान में हिस्सा नहीं लेता है और वह अपनी पार्टी के पंद्रह दिनों के भीतर  क्षमादान नहीं पाता है । तो ऐसी स्थिती में वह व्यक्ति अपनी सदस्यता देता है।
  •  निर्दलीय सदस्यों के बारे में प्रावधान है , कि अगर संसद या विधानमंडल का कोई निर्दलीय सदस्य किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर लेता है तो वह अयोग्य करार दे दिया जाएगा ।
  • मनोनित सदस्य क्यों की बात करें तो यदि कोई मनोनित सदस्य नाम निर्देशित होने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है , तो वह अयोग्य माना जाएगा ।
  • इसके अलावा सदन का अध्यक्ष बनने वाले सदस्य को कानून से छूट प्राप्त है । वह चाहे तो संबंध राजनीतिक दल को छोड़ सकता है, ऐसी स्थिती में उसकी सदस्यता नहीं जाएगी ।
  • हालाँकि इन्हीं प्रावधनों के साथ साथ कुछ अपवादों का भी उल्लेख है ,यह विशेष परिस्थितियां हैं, जिनमें दलबदल करने पर भी कोई सदस्य अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकेगा ।
  • दल बदल विरोधी कानून में एक राजनीतिक दल को किसी अन्य राजनीतिक दल में या उसके साथ विलय कर की अनुमति दी गई है । बशर्ते कि उसे कम से कम दो तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हो । ऐसे में न तो दलबदल कर रहे सदस्यों पर यह कानून लागू होगा और ना ही राजनीतिक दल पर ।
  • गौरतलब है 52 वें संविधान संशोधन में किसी दल के एक तिहाई सदस्यों द्वारा नए दल की स्थापना को दलबदल के तहत छूट दी गई थी । लेकिन 91वे संशोधन 2003 के द्वारा इसे समाप्त कर दिया गया । अब अगर किसी दल का दो तिहाई सदस्य दूसरे दल में विलय के पक्ष में हो तो इसे दलबदल के तहत अवैध नहीं माना गया है।
  •  संशोधन के और दसवीं अनुसूची के पैरा 3 को खत्म कर दिया गया । जिसमें प्रावधान था, कि एक तिहाई सदस्य एक साथ दलबदल कर सकते हैं।  दसवीं अनुसूची के पैरा छह में कहा गया है ,कि सदन के अध्यक्ष या सभापति के पास सदस्यों को अयोग्य करार देने संबंधी निर्णय लेने की शक्ति है।  अगर सदन के अध्यक्ष या सभापति से संबंधित कोई शिकायत प्राप्त होती है । तो सदन द्वारा चुने गए किसी अन्य सदस्य इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है।

 हालांकि स्पीकर या सभापति की इस शक्ति पर बार बार विवाद हो चुका है , और कई बार मामले कोर्ट में भी जा चूके हैं।
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दलबदल विरोधी कानून

अध्यक्ष या सभापति की भूमिका

 अध्यक्ष या सभापति को निर्णय की शक्ति मिलने की हमेशा से ही आलोचना की जाती रही है, न केवल आलोचना हुई बल्कि समय समय पर अध्यक्ष के निर्णय पर विवाद भी होता रहा है । अध्यक्ष को मिली शक्ति की आलोचना दो वजहों से होती रही है । एक तो यह कि वह खुद किसी राजनीतिक दल का सदस्य होता है, ऐसे में उसके निर्णय की निष्पक्षता पर हमेशा ही सवाल उठता रहा है । 
  • दूसरी वजह ये है एक अध्यक्ष के पास निर्णय के लिए विधिक ज्ञान हों यह जरूरी नहीं है। साथ ही हर अध्यक्ष के पास पर्याप्त अनुभव हो यह भी जरूरी नहीं है । यही कारण है कि दो लोकसभा अध्यक्ष रवि राय और शिवराज पाटिल ने दलबदल परिवर्तन मामले में न्याय निर्णयन की अपनी उपयुक्तता पर संदेश ज़ाहिर किया । प्रारंभ में कानून के मुताबिक अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता था और इस पर किसी भी कोड में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता था। 
  • लेकिन कीहोतो होलोहन बनाम मामला जाचिल्हु मामला में सुप्रीम कोर्ट ने इस उपबंध को असंवैधानिक करार दे दिया था। कोर्ट ने इस उपबंध को सुप्रीम कोर्ट(SC) , हाई कोर्ट (HC) के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने की एक कोशीश बताया। कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि अध्यक्ष का निर्णय अंतिम नहीं होगा और इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है । न्यायालय ने माना कि 10वी अनुसूची के प्रावधान संसद और राज्य विधानसभाओं में निर्वाचित सदस्यों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं करते हैं। 
  •  इस कानून को भले ही अदालत भी दुरुस्त बता रही हो लेकिन इस पूरी व्यवस्था भी कोई कम आलोचना नहीं हुई है इसमें कोई शक नहीं कि इस व्यवस्था ने देश के राजनीतिक जीवन में एक नए युग का सूत्रपात किया।  लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई कमियों के कारण यह कानून दलबदल पर रोक नहीं लगा सका।


ऐसे में सवाल है कि क्या इस कानून की आलोचना किन किन बिंदुओं पर किया जा सकता है।
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दलबदल विरोधी कानून

 दल बदल कानून की आलोचना

संविधान में दसवीं अनुसूची का मतलब दलबदल पर रोक लगाना था। लेकिन यह कानून इस लक्ष्य को प्राप्त करने में प्रभावी सिद्ध नहीं हो सका । हालांकि शुरुआत में भी यह कानून व्यक्ति के बजाए सामूहिक दलबदल को प्रोत्साहित कर रहा था।
  •  लेकिन 91 वें संविधान संशोधन के बाद तो इस सामूहिक दलबदल की व्यापक और बढ़ गयी।
  •  दूसरे शब्दों में कहें तो बड़े पैमाने पर दलबदल को कानूनी मान्यता मिल गयी।
  • इसके बारे में जाने माने राजनीतिक मधु लिमये ने कहा था कि "खुदरा के बजाए थोक रूप से दलबदल को मान्यता मिल गई है " 
  • यही कारण है कि अयोग्यता से छूट संबंधी प्रावधान की आलोचना होती रही है । क्योंकि इस प्रावधान की सरकार को अस्थिर करने में बड़ी भूमिका रही है। छोटे आकार वाली विधानसभा वाले राज्यों में सरकार के अस्थिर होने का ख़तरा हमेशा ही बना रहता है।
  •  गोवा का उदाहरण इसी का एक पहलू है। दरअसल इस कानून के प्रावधान असहमति और दलबदल में फर्क करने में नाकाम रहे । यह कानून विधायिका को असहमति के अधिकार और सदविवेक आजादी देने में रुकावट बना । लोकतंत्र में संवाद की संस्कृति का अत्यंत महत्व है, लेकिन दलबदल विरोधी कानून की वजह से पार्टी लाइन से अलग मगर अहम विचारों को नहीं सुना जाता है।
  • लिहाजा इसमें अनुशासन के नाम पर दल के स्वामित्व वाली स्थिती को पैदा किया । यही कारण है कि प्रसिद्ध कानून में सोली सोराबजी ने कहा था कि "रोगों की तुलना में उपचार घटिया नहीं होना चाहिए"  यानी जैसी बीमारी हो इलाज भी वैसा ही होना चाहिए ।
  • यूं तो जनता का जनता के लिए और जनता द्वारा शासन ही लोकतंत्र है । लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है उसकी अनुमति से शासन होता है, और उसकी प्रगति के शासन का एकमात्र लक्ष्य माना जाता है।  लेकिन यह कानून जनता का नहीं बल्कि दलों के शासन की व्यवस्था या पार्टी राज़ को बढ़ावा देता है । 
  • कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है, कि दुनिया के कई परिपक्व लोकतंत्रों में दल बदल विरोधी कानून जैसी कोई व्यवस्था नहीं है ।

उदाहरण के लिए इंग्लैंड , ऑस्ट्रेलिया,  अमेरिका आदि देशों में यदि जन प्रतिनिधि अपने दलों के विपरीत मत रखते हैं या पार्टी लाइन से अलग जाकर वोट करते हैं। तो भी वे उसी पार्टी में बने रहते हैं।
  •  इसके अलावा देखे तो यदि कोई निर्दलीय सदस्य किसी दल में शामिल हो जाता है । तो उसकी सदस्यता खत्म हो जाती है । जबकि नामित सदस्य किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो सकते हैं
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     दल बदल विधेयक कानून
आगे की राह क्या हो ?

1985 में जब राजीव गाँधी सरकार ने 52 वें संविधान संशोधन अधिनियम की नींव रखी तब सभी को यही लगा कि यह पहले भारतीय राजनीति में मील का पत्थर साबित होगी ।
  • इस भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण क्षण कहाँ गया और ऐसा लगा जैसे दलबदलुओं के दिन अब लद गए।  लेकिन किसने सोचा था कि दलबदल पर लगाम लगने की बजाए यह समस्या और बड़ी चुनौती बनकर उभरेगी।
  • यही कारण है कि 34 साल बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय को दलबदल प्रवृति पर चिंता ज़ाहिर करनी पड़ रही है ।
  • दरासल दलबदल की समस्या को खत्म करने के लिए की गई व्यवस्था उपयुक्त नहीं है । इसमें उल्लेखित कुछ अपवाद इस कानून की सफलता में रुकावट है। 
  • यही कारण है कि दिनेश गोस्वामी समिति ने 1990 की अपनी रिपोर्ट में 10 वीं अनुसूची में अयोग्यता से छूट वाले प्रावधान को हटाने की बात कही थी ।
  • 1999 में विधि आयोग और 2002 में संविधान की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने भी इस प्रावधान को खत्म करने की बात कही थी । इसकी वजह है कि छोटी विधानसभा आकार वाले राज्यों में दल बदल करना बेहद आसान होता है। और सरकार के हमेशा अस्थिर होने का खतरा लगा रहता है। 
  • इससे इतर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने खाँस वजहों से एक स्वतंत्र संस्था की स्थापना का सुझाव दिया है। दरासल स्पीकर किसी राजनीतिक दल का एक सदस्य होता है । और इसलिए उनके फैसले की निष्पक्षता पर हमेशा ही सवाल उठते रहे हैं । ब्रिटेन की तरह नहीं कि एक बार स्पीकर बनने के बाद संबंधित दल की सदस्यता त्याग नहीं पड़ती है। और वह रिटायरमेंट तक सदन का स्पीकर बना रहता है।
  • ब्रिटेन में सरकार चाहे किसी भी दल की हो स्पीकर वही व्यक्ति होता है । यदि बिना निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए यह एक शानदार कवायद है। क्योंकि इससे स्पीकर के कार्यकाल की सुरक्षा हमेशा सुनिश्चित रहती है।

 लेकिन ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था का अनुसरण करने वाले भारत में स्पीकर जैसा संस्था दलगत स्वार्थों से अभी तक बाहर नहीं निकल सकी है ।
  • ऐसे में स्वतंत्र संस्था बनाकर दलबदल के फैसलों को निष्पक्ष बनाने की एक कोशीश की जा सकती है। इस संस्थान में राजनीति इसे लेकर कानून तक के जानकार को शामिल किया जाना चाहिए ।
  • एक उपाय यह भी है कि दल बदल पर फैसला लेने का जिम्मा चुनाव आयोग को दे दिया जाए । इस संबंध में चुनाव आयोग का भी मानना है कि उसकी स्वयं की भूमि का व्यापक होनी चाहिए । ऐसे में 10 वीं अनुसूची के तहत चुनाव आयोग की बाध्यकारी सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा निर्णय लेने की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
  • लेकिन इसमें एक दुविधा यह है कि चुनाव आयोग में शामिल लोग प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। जबकि इस तरह के निर्णय में कानून के जानकारों की जरूरत होगी । लिहाजा चुनाव आयोग के कंधों पर जिम्मेदारी देने से पहले कई पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है।
  •  एक विचार यह भी है कि दल बदल प्रवृत्ति एक राजनीतिक समस्या है और इसके समाधान के लिए कानूनी तरीके अपनाए जा रहे हैं। ऐसे में लगता है कि कानूनी समाधान की बजाए राजनीतिक सुधार ध्यान देना ज्यादा बेहतर होगा राजनीतिक दलों को अपने स्तर पर ही सुधार लाना चाहिए । सांसदों विधायको की बातों को सुनने और पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने की जरूरत है ताकि इन बागी होने की नौबत ही ना आएं । बहरहाल सभी राजनीतिक दलों और केंद्र सरकार को इमानदारी से चिंतन करने की जरूरत है कि समस्या का समाधान कैसे निकाला जाए ।


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