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शास्त्रीय नृत्य ( Classical dance )

शास्त्रीय नृत्य ( Classical dance ) भारत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र एवं  आचार्य नंदीकेश्वर द्वारा रचित अभिनय दर्पण में शास्त्रीय नृत्य का वर्णन है।
 शिव की नटराज  मूर्ति शास्त्रीय नृत्य का प्रतीक है।  जबकि नाट्य शास्त्र में उल्लेखित मुद्रा ही शास्त्रीय नृत्य का मूल आधार है।
वर्तमान में आठ शास्त्रीय नृत्य प्रचलित है ।


दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य :-

तमिलनाडु का भरतनाट्यम-
   
       यह 200 वर्ष से अधिक पुरानी तमिल संस्कृति के लोकप्रिय एकल देखते हैं । शुरुआती दिनों में मंदिर की देवदासियों द्वारा भगवान की मूर्ति के समक्ष नृत्य किया जाता था।
 इसमें सम्मिलित रूप से नृत्य-अभिनय और शारीरिक भंगिमा पर विशेष बल दिया जाता है ।
  • इस समिति का आरंभ आलारिपु या स्तुती से होता है , जबकि इसका अंत तिललाना से होता है ।
  • इसके नृत्य गायन स्थिती में गायक मृदंगम वादक, मंजीरा वादक , और बांसुरी वादक या वीणावादक शामिल हैं ।
  • इसके अलावा एक व्यक्ति  नट्टूवनार है, जो नृत्य का कविता पाठ करता है।

 इस नृत्य के प्रमुख कलाकार हैं ,यामिनी कृष्णमूर्ति, सोनल मानसिंग, प्रणालीनी साराभाई और मल्लिका साराभाई ।

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शास्त्रीय नृत्य ( Classical dance )


कथकली नृत्य (केरल)  -

यह केरल के स्थानीय लोक नाटक कूडियाट्टम एवं कृष्णाटम इसके प्रेरणा स्रोत हैं।  इस न्रत्य में नर्तक द्वारा रामायण ,महाभारत एवं पुराण के चरित्रों का अभिनय किया जाता है।
  •  इससे चेहरे के हाव-भाव नेतृत्व एवं भौहो की संचालन नाक और थोड़ी की अभिव्यक्ति पर विशेष जोर दिया गया है ।
  • इस समिति में दो प्रकार के पात्र हैं पहला नायक (पाचा) और दूसरा  खलनायक (कथी)।
  •  इस नृत्य में नर्तक के चेहरे पर हरा , लाल,  पीला, काला वा सफेद रंग का प्रयोग किया जाता है। जिसमे हर रंग सद्गु एवं मर्यादा , लाल रंग पाप , काला रंग तामसिक एवं पीला रंग सात्विक और राजसिक स्वभाव का सूचक है।
  • नियमित केरल के साथ साथ कर्नाटक क्षेत्र में भी प्रचलित है । 

इसके प्रमुख कलाकार हैं-  कलामंडलम रामन पुट्ठी नायर , रीता गांगुली और सदानम कृष्णनकुट्टी।

  मोहिनीअट्टम ( केरल )-

          एकल महिला द्वारा इसका प्रस्तुतीकरण किया जाता है। मान्यता है कि इसका विकास भस्मासुर वध के लिए  विष्णु द्वारा मोहिनी रूप लेने की कथा से हुआ है ।
  • इसमें भावनाओं के साथ कदम ताल शारीरिक हावभाव जैसे-आँखों एवं इशारों की अभिव्यक्ति और संगीत का समाधान है।
  • नित्य की गति में नियन्त्रण रखना इसकी विशेषता है। इस में प्रयोग किए जाने वाले संगीत यंत्र भी मृदंगम , वीणा और मंजीरा है ।

इसके प्रमुख कलाकार वैजन्तीमाला, हेमामालिनी सुमंदि नायक , , गोपिका वर्मा और पल्लवी कृष्णन है।


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शास्त्रीय नृत्य ( Classical dance )

 आंध्र प्रदेश का कुचीपुड़ी नित्य-

यह गीत एवं नृत्य का समन्वय है। और भागवत पुराण इसका मुख्य आधार हैं।
  • इस नृत्य ने पद संचालन और हस्तमुद्रा का विशेष महत्व है। इसमें नर्तक द्वारा का संगीत रूप से कथोपकथन का प्रयोग किया जाता है ।
  • उसमें पीतल की तस्तरी में पैर रखकर नित्य करने की परंपरा है ।
  • इसके अलावा नर्तक नृत्य के दौरान अपने पैर के अंगूठे से फर्श पर एक आकृति बनाता है।
  •  इस नृत्य को दो शैलियों हैं , नृत्य नाटक एवं एकल नृत्य प्रस्तुति।
  • इसमें गायक एक मृदंगम वादक,  वीणा वादक और मंजीरा वादक शामिल हैं ।

इसके प्रमुख कलाकार हैं-  राधा रेड्डी, भावना रेड्डी, राजा रेड्डी और यामिनी रेड्डी।


 पूर्वी और पूर्वोत्तर भारतीय शास्त्रीय नृत्य:-

 ओडिशा का ओडिसी -

          शुरुआत में इसे महरिस अथवा देवदासियों द्वारा किया जाता था।  12 शताब्दी में इस नृत्य पर वैष्णवबाद का प्रभाव पड़ने पर भगवान जगह आज इसके केंद्र बिंदु बने।
  • ब्रह्मेश्वर एवं कोणार्क के सूर्य मंदिरों के शिलालेखों में इस नृत्य का उल्लेख मिलता है ।
  • इस नृत्य में भगवान कृष्ण की प्रचलित कथाओं के आधार पर नृत्य किया जाता है। 
  • इसमें प्रयोग होने वाले छंद संस्कृत नाटक गीत गोविंदम के लिए गए हैं यह नृत्य त्रिभंग मुद्रा में किया जाता है।
  • त्रिभंग में एक पाव मुड़ा जाता है, और देह थोड़ी किंतु विपरीत दिशा में कटी एवं ग्रीवा पर वक्र की जाती हैं।
  • इस नृत्य की मुद्राये एवं अभिव्यक्ति भारतनाट्यम से मीलती जुलती है।
  • इसमें एक पखावज वादक जो कि स्वयं गुरु होता है, एक गायक एक बांसुरी वादन एक सितार ओर मंजीरा वादक शामिल हैं।
 इससे जुड़े प्रमुख कलाकार हैं- सोनल मानसिंग, कुमकुम मोहंती माघवी मुदगल और आदिति बन्धोपाध्याय।

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शास्त्रीय नृत्य ( Classical dance )


 मणिपुरी (मणिपुर) 

 यह 18 वीं शताब्दी में वैष्णव संप्रदाय के साथ विकसित हुआ है। इसमें  विष्णु पुराण , भागवत पुराण तथा गीत गोविंद के कथानकों का प्रस्तुतीकरण किया जाता है ।
  • इस नृत्य में भक्ति पर अधिक ज़ोर दिया जाता है, एवं इसमें तांडा और लास्य से दोनो का समावेश सकता है ।
  • ससे शरीर की गति धीमी एवं संकेत और शारीरिक गतियों का प्रयोग किया जाता है। 
  • ढोल इस नृत्य की आत्मा है। एवं नर्तक द्वारा गुरु का प्रयोग नहीं किया जाता हैं।
  • इस नृत्य के विभिन्न रूप जैसे - रासलीला संकीर्तन और थांगटा है।  रासलीका में राधा, कृष्ण और गोपियों पर आधारित नृत्य किए जाते हैं।  
  • संकीर्तन में पुरुष नर्तक झुक कर नित्य करते समय पोंग और करताल बजाते हैं । 
  • थांगटा में युद्ध संबंधी दृश्यों का प्रदर्शन किया जाता है। इससे पुंग ढोल और वसूरी जैसे- वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

 इससे जुड़े प्रमुख कला और है - गुरु नभ कुमार, गुरु विपिन सिंह झावेरी बहने , नयना,  सुवर्णा और दर्शना ।

सत्रिया नृत्य (असम )
         
     इस नृत्य शैली का विकास 15 वीं शताब्दी ईस्वी में वैष्णव संत शंकरदेव ने किया था।  यह संगीत तथा अभिनय का सम्मिश्रण है ।
शंकरदेव द्वारा इसे अंकिया नाट के प्रदर्शन के लिए विकसित किया गया था । 
  • इसमें हाथ से इशारे कदमों का प्रयोग गति और अभिव्यक्ति पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  •  इसमें ढोल ,ताल, बांसुरी एवं हारमोनियम का प्रयोग सकता है ।
  • इस नृत्य को अप्सरा नृत्य,  चाली नृत्य , दशावतार नृत्य ,  रास नृत्य आदि विधओं में बांटा गया है। 
इससे जुड़े प्रमुख कलाकार हैं - रामकृष्ण तालुकदार और रांची कृष्णाक्षी कश्यप।

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शास्त्रीय नृत्य ( Classical dance )

 उत्तर भारतीय शास्त्रीय नृत्य-

 कथक नृत्य-

             उत्तर भारत का एक मुख्य नृत्य है । जो आज मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश ,राजस्थान और मध्यप्रदेश में प्रचलित है। तथा उत्तर प्रदेश की ब्रज भूमि की रासलीला परंपरा से जुड़ा । एवं इसके केंद्र में राधाकृष्णन् की अवधारणा मौजूद हैं।
  •  कथक का उद्भव तथा शब्द से हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ "कथा कहना" होता है। 
  • इसमें हस्तमुद्रा तथा पदतल पर अधिक ध्यान दिया जाता है । और इसकी ख़ास विशेषता में पद संचालन और चक्कर काटना होता है।
  •  इसको ध्रुपद एवं ठुमरी गायन के माध्यम से व्यक्त किया जाता है । 
  • किसी नटवरी नृत्य भी कहा जाता है ।
  •  शास्त्रीय नीतियों में कथक का संबंध इरानी एवं मुस्लिम संस्कृति से भी है। 
  • इसके प्रमुख रानी है -जयपुर घराना, लखनऊ घराना , बनारस राना और रायगढ़ घराना ।
  • इसमें मुख्य रूप से तबला पखावज और सारंगी जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है ।

सके प्रमुख कलाकार हैं -पंडित लच्छू महाराज , पंडित बिरजु  महाराज, सितार देवी, पंडित जयलाल, पंडित सीताराम प्रसाद।

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